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Tuesday, January 30, 2018

लाइफ़ कोच: ख़ुद को कोसने वालों का साथ बर्फ की सिल्ली पर लेटने से कम नहीं


बागवानी का बेहद शौक होने के बावजूद उसने कभी कोई पौधा खुद अपने हाथों से नहीं रोपा. वक्त की कमी नहीं. हर शाम दफ्तर के बाद घंटाभर माली को निर्देश देने में बीतता है. वो बताता है कि किस पेड़ की बाड़ अब काट दी जानी चाहिए. किस पौधे को कांट-छांट की जरूरत है. किसे थोड़े दिनों के लिए औरों के हिस्से की भी धूप चाहिए.

शहर के व्यस्ततम इलाके में घर होने के बावजूद उसके बागीचे की पत्तियों पर धूल की झीनी परत भी नहीं जमने पाती. पौधों में अंकुर फूटने के बाद वो उन्हें किसी बच्चे-का-सा दुलराता है. वो खुद पौधे नहीं लगाता क्योंकि उसे डर है कि उसके लगाए पौधे सूख जाएंगे. 

पता नहीं बचपन के किस कोने की ये याद अब भी उसके मन में उतनी ही जिंदा है. शौक से उसने कोई पौधा लगाया और हर दिन उछाह से आंगन में देखता कि उसके रोपे पौधे में जान आई या नहीं. पौधा अपने मरने के साथ उसके मन में ये डर रोप गया कि उसके हाथों लगाए पौधे नहीं जीते. आप या आपके आसपास भी ऐसा कोई जरूर होगा, जो कोई काम करने से महज इसलिए कतराता होगा कि उसके हाथों चीजें नहीं फलतीं. या फिर बिल्ली के रास्ता काटने पर तंज से ये कहने वाले भी दीख पड़ते हैं कि आज बिल्ली का दिन खराब है.

मजाक में कही जाने के बावजूद ये बातें बताती हैं कि कहने वाले के दिल में कहीं न कहीं कुछ बहुत गहरे धंसा हुआ है. इससे निजात पाने की जगह लोग अक्सर इसे अपने सेंस ऑफ ह्यूमर का हिस्सा मान लेते हैं. जाने-अनजाने खुद को कोसते रहते हैं. ऐसे लोगों का साथ भी किसी यंत्रणा से कम नहीं होता.
ऐसे ही एक इंसान से एक बार मेरा भी साबका पड़ा. जब भी वो खुद किसी बात पर उसके 'पैमाने' के हिसाब से ज्यादा गहरी सांस ले लेता, तुरंत कह पड़ता- आज का दिन खराब जाने वाला है, ऐसा मेरे साथ हमेशा होता है कि जब मेरी सांसें गहरी होती हैं, दिन बिगड़ जाता है. खुद को कोसने वाली बातों की उसके पास भरमार थी.

बौद्धिक रूप से बेहद समृद्ध और हंसोड़ होने के बावजूद उसके साथ बिताया सारा वक्त मेरे लिए बर्फ की सिल्ली वाले टार्चर से कम नहीं था. कहना न होगा, फिर मैंने उसके साथ वक्त बिताने का हर मौका भरपूर टाला.

क्या आप भी ऐसे किसी इंसान को जानते हैं जो बात-बात पर खुद पर ही तंज कसता है, वो भी ऐसी बातों के लिए जो उसके बस में नहीं. आत्मदया की ये भी एक अलग किस्म है. इसका मरीज अक्सर बचपन में घटी किसी घटना के कारण इस हद तक परेशान हो जाता है कि उसे अपनी जिंदगी की हकीकत मान बैठता है.

हमारे देश के कुछ हिस्सों में इसके लिए बाकायदा एक शब्द भी इजाद किया गया है- पनौती. फलां इंसान फलां चीज़ के लिए पनौती है. कई लोग खुद को ही पनौती मानते हुए कोसते रहते हैं.

खुद को औरों से अलग मानना अच्छा है लेकिन इस अलग होने के लिए आत्मदया कतई अच्छी नहीं. पनौती जैसे किसी मिथक से बाहर निकलकर देखें. उसके हाथों लगाए पौधे मर जाते तो उसका बगीचा कभी इतना फलता-फूलता नहीं. जैसे आपको बिल्ली के रास्ता काटने से कोई फर्क नहीं पड़ता, वैसे ही बिल्ली को आपकी अच्छी-खराब किस्मत से कोई सरोकार नहीं. उस पौधे को मुरझाए काफी वक्त बीता, अब एक पौधा लगाकर देखें.

Saturday, January 13, 2018

जिंदगी को दें सकारात्मकता का तोहफा


सकारात्मक- एक भाव जिसे पाने के लिए लोग कितने जतन करते हैं. सकारात्मकता का महत्व जीवन में रिश्ते निभाने से लेकर अपने भविष्य को संवारने तक हर चीज में है. इसलिए जीवन के हर मोड़ पर इसका महत्व बढ़ जाता है. सही मायने मे सकारात्मकता का मतलब है हर परिस्थिति मे एक सुनहरी किरण देखना. किसी भी घटना का वो भाग देखना जो कि आपको उसके होने का मर्म समझाए.

हम अक्सर ऐसे लोग रहते हैं जो कि हर वक्त खुश ही रहते हैं, वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जो हर समय किसी न किसी चिंता में डूबे रहते हैं.  तो क्या राज है इसका ? क्या उन्हे सब कुछ मिल चुका है और इसलिए वे खुश है या फिर उन्हे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, वे पर चीज में कुछ अच्छा ढूंढ ही लेते है.

तो आइए आपको बताते है इस जादू को कैसे चलाया जाए कि आपकी हंसी आपके चेहरे से कभी अलग न हो.

हर घटना के पीछे कारण
एक बात जान लें कि जो भी होता है उसके पीछे एक कारण जरूर होता है. हो सकता है कि तब आप उससे सहमत न हो लेकिन कभी न कभी आपको उस घटना की मर्म जरूर समझ आता है. इसे ऐसे समझ सकते है कि आप चढ़ाई चढ रहे हैं तो आपको ठीक से रास्ता नहीं दिखेगा. वहीं जब आप सभी मुश्किलों से निकलकर ऊंचाई पर पहुंच जाते हैं तो आपको रास्ता साफ नजर आने लगता है.

Sunday, November 12, 2017

जावेद अख्तर ने 'पद्मावती' की कहानी को बताया नकली !


मशहूर गीतकार और शायर जावेद अख्तर 'पद्मावती' की कहानी को ऐतिहासिक नहीं मानते. उन्होंने कहा कि इसकी कहानी उतनी ही नकली है, जितनी सलीम अनारकली की. इसका इतिहास में कहीं भी उल्लेख नहीं है. उन्होंने सलाह दी है कि अगर लोगों को वाकई इतिहास में अधिक रुचि ही है, तो इन फिल्मों की बजाए गंभीर किताबों से समझाना चाहिए.

जावेद साहब ने साहित्य 'आज तक' के लंबे सेशन में ये बातें कहीं. एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "मैं इतिहासकार तो हूं नहीं, मैं तो जो मान्य इतिहासकार हैं उनको पढ़कर आपको ये बात बता सकता हूं."

एक टीवी डिबेट का हवाला देते हुए जावेद अखतर ने कहा, "टीवी पर इतिहास के एक प्रोफेसर को सुन रहा था. वो बता रहे थे कि 'पद्मावती' की रचना और अलाउद्दीन खिलजी के समय में काफी फर्फ था. जायसी ने जिस वक्त इसे लिखा और खिलजी के शासनकाल में करीब 200 से 250 साल का फर्क था. इतने साल में जब तक कि जायसी ने पद्मावती नहीं लिखी, कहीं रानी पद्मावती का जिक्र ही नहीं है."

जावेद अख्तर ने कहा, 'उस दौर (अलाउद्दीन के) में इतिहास बहुत लिखा गया. उस जमाने के सारे रिकॉर्ड भी मौजूद हैं, लेकिन कहीं पद्मावती का नाम नहीं है. अब मिसाल के तौर पर जोधा-अकबर पिक्चर बन गई. जोधाबाई 'मुगल-ए-आजम' में भी थीं. तथ्य है कि जोधाबाई, अकबर की पत्नी नहीं थी, अब वो किस्सा महशूर हो गया. मगर हकीकत में अकबर की पत्नी का नाम जोधाबाई नहीं था, कहानियां बन जाती हैं उसमें क्या है.'
नई पीढ़ी को इतिहास की सलाह देते हुए जावेद साहब ने कहा, "फिल्मों को इतिहास मत समझिए और इतिहास को भी फिल्म से मत समझिए. हां, आप गौर से फिल्में देखिए और आनंद लिजिए, इतिहास में रुचि है, तो गंभीरता से इतिहास पढ़िए, तमाम इतिहासकार हैं उन्हें आप पढ़ सकते हैं."

Friday, November 3, 2017

लव बर्ड्स के चक्कर में क्यों ट्रोल हुईं तापसी पन्नू?


'ट्रोल' ऐसा शब्द बन गया है कि आप इससे जुड़ी एक या दो खबरें रोज सुन ही लेते हैं. बॉलीवुड स्टार्स हो या पॉलिटिशियन या फिर कोई फेमस पर्सनैलिटी. कोई भी ट्रोल हो सकता है. वैसे इस मामले में एक्ट्रेसेज पर ज्यादा अटैक होता है. चाहे वो अपने फोटोशूट की तस्वीरें शेयर करें या अपने घर की. ट्रोलर्स उन्हें गालियां देने का मौका ढूंढ ही लेते हैं.

ऐसा ही मौका 'जुड़वां 2' की हीरोइन तापसी पन्नू को देखने को मिला. दरअसल तापसी ने अपने इंस्टाग्राम अकॉउंट पर पक्षियों की फोटो शेयर की थी. पिंजरे में बंद ये पक्षी एक दूसरे के साथ प्रेम भाव से बैठे नजर आ रहे हैं.

फोटो को कैप्शन देते हुए तापसी ने लिखा, ' इनसे सीखें प्यार करना.'
लेकिन उनके फैंस को पिंजरे में बंद पक्षी पसंद नहीं आए. और उन्हें 'पिंक' मूवी का हवाला देते हुए खरी खोटी सुनाना शुरू कर दी.

एक यूजर ने कमेंट किया, 'आजादी और नारीवाद की बात करने वाली आपके जैसी एक्ट्रेस के लिए पक्षियों को यूं कैद करके रखना सही नहीं है.'

वहीं एक दूसरे यूजर ने उन्हें कहा कि पहले इन पक्षियों को आजाद करें. और फिर सीखें कि कैसे प्यार करते हैं.

वैसे ऐसा पहली बार नहीं है कि किसी हीरोइन को ऐसे कमेंट्स का सामना करना पड़ रहा है हो. अभी हाल ही में अमीषा पटेल को उम्र के हिसाब से कपड़े पहनने की सलाहें दी गईं थी. दंगल की धाकड़ गर्ल फातिमा शेख को साड़ी वाली तस्वीर पर मजहब की तहजीब सिखाई जा रही थी.

बता दें कि 'पिंक' मूवी के बाद तापसी एक्ट्रेस के तौर पर बॉलीवुड की हंड्रेड करोड़ क्लब हीरोइंस की लिस्ट में नाम दर्ज करवा चुकी हैं. वरुण धवन के साथ आई उनकी फिल्म 'जुड़वां 2' सुपर हिट साबित हुई. इस फिल्म में उनके अलावा जैकलीन भी थीं.

Tuesday, September 26, 2017

पद्मावती में दीपिका के गहनों का वजन सुन हैरान रह जाएंगे आप


दीपिका पादुकोण की फिल्म 'पद्मावती' लंबे समय से सुर्खियों में बनी हुई है. हाल ही में फिल्म के किरदारों के लुक रिवील किए गए. इसके बाद तो फिल्म की रिलीज का इंतजार और बढ़ गया है.

रॉयल लुक में दीपिका इतनी जम रही हैं कि देखने वाले बस देखते रह जाएं. लेकिन इस लुक को कैरी करने वाली दीपिका ही जानती हैं कि इसके लिए उन्होंने कितनी मेहनत की है.

एक वेबसाइट पर छपी खबर की मानें तो इस फिल्म में दीपिका ने 20 किलो के गहने पहने हैं. रानी 'पद्मावती' के गहने ही नहीं उनके कपड़े भी काफी भारी-भरकम हैं. लेकिन फिल्म की कॉस्ट्यूम डिजाइनर रिंपल नरुला का कहना है कि लोग वजन की बात कर रहे हैं. हमने ऐसा कुछ नहीं बनाया जिसे पहनना नामुमकिन हो.
गहनों और कपड़ों के अलावा दीपिका का यूनीब्रो लुक भी काफी चर्चा में है. इससे पहले काजोल, शिल्पा शेट्टी जैसी एक्ट्रेसेज इस लुक में नजर आ चुकी हैं. लेकिन दीपिका ने इस फिल्म के लिए खास तौर पर यह लुक अपनाया. दीपिका से अलग शाहिद का लुक भी बेहतरीन लग रहा है.



Saturday, September 9, 2017

दहेज़प्रथा का समर्थन करता बेटी का पिता


अज़ाद खबर संवाददाता, मंजुल मंजरी ( बिहार )
( दहेज़रोधी विशेषज्ञ )

“मेरी प्यारी गुडिया रानी ...तुझे मैं एक सुन्दर राजकुमार सा दूल्हा लाकर दूंगा ...जो तुझे जीवन भर पलकों पर बिठा कर रखेगा ” ..प्रत्येक  बाप का अपनी बेटी के प्रति किया गया वादा ...जो उसे लालच देता है एक ऐसे सुखद भविष्य को जिसे वर्तमान में संजोये गए सपनों से खरीदा जाना है ...पिता चाहता है की उसकी बेटी की शादी एक ऐसे व्यक्ति से हो जो सफल हो समाज में और ऊँचे रसूख वाला भी हो ...एक पिता की अपनी बेटी के प्रति यह सोच गलत भी नही है ...मगर उसे पता है की बिटिया के लिए ऐसे सुन्दर राजकुमार को ज़िन्दगी में लाने के लिए एक भारी कीमत अदा करनी होगी ...जिसे दहेज़ कहा  जाता है ....
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पिता का यही भावुक लालच वर पक्ष में जाकर पैसे के लालच में तब्दील हो जाता है ...वर का पिता बेटी का पिता का सपना पूरा करने के लिए एक मोती रकम की मांग करता है ..यदि बेटी का पिता सक्षम है तब तो मांग से ज्यादा अदायगी कर दी जाती  है ..लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर पिता अपने बेटी का नया घर सजाने में उसके पुराने घर (मायके ) तक को गिरवी रख देता है ...और एक ऐसा कर्ज़दार बन जाता है ..जिसे चुकाने में उसकी बूढी हड्डियाँ चटक जाती हैं ...फिर भी वर पक्ष की मांग खत्म नही होती ...एक सफल दामाद की चाहत में बेटी का पिता इस दहेज़ रूपी कर्मकांड का मुख्य वाहक बन जाता है ...
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सब जानते हैं की दहेज़ एक कानूनी अपराध है साथ में समाज का गन्दी कुरीति भी ..मगर इसे ख़त्म करने की पहल कोई नही करना चाहता ..क्योंकि लालच सबके अन्दर है ..बेटी के पिता को एक अच्छे वर की और बेटे के पिता को अच्छी रकम की ...दोनों ही समान रूप से इसके अपराधी भी हैं और भुक्तभोगी भी ...आईएस ,डॉक्टर ,इंजिनियर और सरकारी नौकरी में कार्यरत दुल्हों का शादी का रेट क्या है ..ये सभी लोगों को पता है ..यानी हम सब इस वर मंदी के खरीददार भी हैं ..और दुकानदार भी ...
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क्या इस दहेज़ रूपी कुरीति से बेटी का बाप कभी बाहर आ सकता है ...हाँ क्यों ..आ सकता है ..यदि हम अपनी बेटियों को ही आत्मनिर्भर बना दे ..तब ..उन्हें खुद अपनी जीवनसाथी को चुनने में उनकी सहमती देने का अधिकार प्रदान करें ...एक राजकुमार पाने के ख्वाब दिखाने के बजाय उसे शिक्षित कर वास्तविक रूप में आर्थिक आत्मनिर्भर बनाये तब ...हम क्यों नही बेटियों को उसकी शादी के बजाय उसके करियर को तरजीह देते हैं ..आखिर क्यों एक लड़का ही अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए दवाब में रहे ...आप अपनी बेटियों को इतना सशक्त क्यों नही बनाते की कल बेटे का पिता अपने बेटे को यह ख्वाब दिकाए की तुम्हारे लिए एक सफल पत्नी लाकर दूंगा ..जो तुम्हारा हर कदम पर साथ निभाएगी ...आप अपनी लालच को बेटी के सफल करियर के लाच में क्यों तब्दील नही करते ...यदि आपकी बिटिया कमाने और घर चलाने में खुद ही सक्षम होगी ..तो क्या ज़रूरत पड़ेगी महंगा वर खरीदने की ...
.................................................................................याद रखें :-बेटियों को नाज़ुक राजकुमारी न बनाकर पालें ..उन्हें मौक़ा दें एक सफल युवती बनने में ...और सफलता पाने के बाद किसी राजकुमार की नही उसे एक अच्छे जीवनसाथी की जरूरत पड़ेगी ..जो दहेज़ के बगैर भी संभव है ...

Monday, September 4, 2017

बॉलीवुड में बगावत के बाद क्या अपना ताज बचा पाएंगी 'क्वीन' कंगना?


लोगों को हमेशा से बॉलीवुड की गॉसिप में इंटरेस्ट रहा है और जब खुद कोई सितारा अपने अफेयर की बातें बताए तो लोग दम साधे इसे सुनते है. ऐसा होता तो कम है पर इस बार हुआ है. बॉलीवुड की 'क्वीन' कंगना ने ऋतिक रोशन समेत कई लोगों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.

कंगना इन दिनों जिसे भी इंटरव्यू दे रही हैं बेबाकी से हर मुद्दे पर अपनी राय देती हैं. चाहे वो करण जौहर हो,ऋतिक हो या फिर आदित्य पंचोली. एक-एक कर कंगना ने सबकी बखिया उधेड़ दी है.

बॉलीवुड में चल रहे भाई-भतिजावाद पर आवाज उठाने वाली कंगना के समर्थन में कम ही लोग आए इसपर उनका कहना है कि बॉलीवुड को कड़वा सच पसंद नहीं आता. हालांकि ये पहली बार नहीं हुआ है.  कंगना ने अपनी फिल्म 'रंगून' प्रमोशन के दौरान भी इस मुद्दे पर खुलकर बात की थी. जिसपर बाद में कंगना की खूब आलोचना भी हुई.

कंगना ने तो अवॉर्ड शो को भी नहीं छोड़ा  उन्होंने कहा कि ये सारे अवॉर्ड शो फर्जी होते हैं इसलिए मैं कभी भी किसी शो में नहीं जाती.
कंगना इतने पर ही नहीं रुकीं, उन्होंने शेखर सुमन और अध्ययन सुमन को भी आड़े हाथों लिया तो अब सवाल ये उठता है कि फिल्म इंडस्ट्री में इतने लोगों को अपने खिलाफ करने वाली कंगना का आगे का सफर कितना मुश्किल होने वाला है!

अब तो ये देखना है कि बॉलीवुड के लिए झांसी की रानी साबित हो रही कंगना को कितने लोगों का सपोर्ट मिलता है क्योंकि इससे पहले ही नेपोटिज्म पर बात करने के बाद IFFA Awards के मंच से सैफ अली खान, वरुण धवन और करण जौहर ने उनका जमकर मजाक उड़ाया था.

कंगना की पिछली फिल्म 'रंगून' बुरी तरह फ्लॉप रही थी ऐसे में अगर 'सिमरन' और 'मणिकार्णिका' ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तो बॉलीवुड में वो लोगों के निशाने पर आ जाएंगी.

Tuesday, August 8, 2017

जिंदगी को दें सकारात्मकता का तोहफा

सकारात्मक, एक भाव जिसे पाने के लिए लोग कितने जतन करते हैं. सकारात्मकता का महत्व जीवन में रिश्ते निभाने से लेकर अपने भविष्य को संवारने तक हर चीज में है. इसलिए जीवन के हर मोड़ पर इसका महत्व बढ़ जाता है. सही मायने मे सकारात्मकता का मतलब है हर परिस्थिति मे एक सुनहरी किरण देखना. किसी भी घटना का वो भाग देखना जो कि आपको उसके होने का मर्म समझाए.

हम अक्सर ऐसे लोग रहते हैं जो कि हर वक्त खुश ही रहते हैं, वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जो हर समय किसी न किसी चिंता में डूबे रहते हैं.  तो क्या राज है इसका ? क्या उन्हे सब कुछ मिल चुका है और इसलिए वे खुश है या फिर उन्हे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, वे पर चीज में कुछ अच्छा ढूंढ ही लेते है.

तो आइए आपको बताते है इस जादू को कैसे चलाया जाए कि आपकी हंसी आपके चेहरे से कभी अलग न हो.

हर घटना के पीछे कारण
एक बात जान लें कि जो भी होता है उसके पीछे एक कारण जरूर होता है. हो सकता है कि तब आप उससे सहमत न हो लेकिन कभी न कभी आपको उस घटना की मर्म जरूर समझ आता है. इसे ऐसे समझ सकते है कि आप चढ़ाई चढ रहे हैं तो आपको ठीक से रास्ता नहीं दिखेगा. वहीं जब आप सभी मुश्किलों से निकलकर ऊंचाई पर पहुंच जाते हैं तो आपको रास्ता साफ नजर आने लगता है.
 
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